क्या करने आये हैं आप धरती पर ?

क्या करने आये हैं आप धरती पर

व्यक्ति  अपने   पूर्व  जन्म  में  जैसे  कर्म  करता है  अपने  उन्हीं  कर्मों   के  फल  स्वरुप  जातक  को एक  नया  जन्म  प्राप्त  होता  है  और  अपने  पिछले जन्म  के  व्यवहार-आचार  के  अनुसार  ही  उसे सगे  सम्बन्धी  प्राप्त  होते  हैं | जातक  के  पिछले जन्म  के  कर्मों का परिणाम होता है  वर्तमान  जन्म |  पूर्वजन्म  में  क्या  किया , कैसे  कर्म  किये  उन्हें  तो  नहीं बदला  जा  सकता  लेकिन  वर्तमान  जन्म के कर्मों को अच्छा करके वह अपना भविष्य अवश्य सुधार सकता है | और अपने इस जन्म को कुछ और  बेहतर  बना  सकता  है | क्या  आप  जानते  हैं  कि  क्यों  मिला  है  आपको  वर्तमान  जन्म ?  क्या लेकर आये है हम अपनी किस्मत में ?  और क्या है इस जीवन का मूल  उद्देश्य ?  इन सब प्रश्नो का उत्तर आपको  आपकी  जन्म  पत्रिका  में  उपस्थित  ग्रहों की  स्थिति  की  पड़ताल  के  द्वारा  जान  सकते  है | आइये जानते है कैसे :-

कुंडली में बृहस्पति ग्रह की स्थिति :-

व्यक्ति की जन्मकुण्डली  में गुरु किस भाव में है और उसकी क्या स्थिति है उसकी पड़ताल के अनुसार हमे व्यक्ति के पूर्व जन्म   के अच्छे- बुरे कर्म  और वर्तमान जन्म का क्या मूल उदेश्य है  यह सब जान सकते है |

प्रथम भाव:- व्यक्ति की जन्म कुण्डली में गुरु प्रथम भाव में उपस्थित हो तो व्यक्ति को अपना वर्तमान जन्म किसी आशीर्वाद  या फिर किसी के श्रापवश  हुआ होता है और जातक को उसी के अनुरूप  सुख व  दुख प्राप्त होते है |

द्वितीय व अष्टम भाव :- जातक की जन्म पत्रिका में गुरु ग्रह की अष्टम या द्वितीय भाव में उपस्थित उसके पूर्वजन्म में संत-या महात्मा होने का संकेत देती है | वर्तमान जन्म में यह बहुत धार्मिक होते हैं  और इनका इनका जन्म एक अच्छे परिवार में हुआ होता है यह अपनी इच्छापूर्ति के उद्देश्य से इस जन्म को प्राप्त करते है |

तृतीय भाव :- जातक की जन्मकुण्डली में बृहस्पति का तृतीय भाव में उपस्थित होना जातक के जन्म को किसी महिला के आशीर्वाद या श्राप का फल दर्शाता है और यह महिला उसके वर्तमान जन्म के परिवार से ही होती है इसके जन्म के सुख और दुख महिला के आर्शीर्वाद और श्राप पर निर्भर करते है |

चतुर्थ भाव:- जन्म कुण्डली  में बृहस्पति का चतुर्थ भाव में उपस्थित होना उसके पूर्व जन्म में भी इसी परिवार का सदस्य होने का संकेत देता है | पूर्व जन्म में अधूरे रह गये कार्यों को पूर्ण करने के उद्देश्य से वह दुबारा उसी परिवार में जन्म प्राप्त करते है और कार्य की पूर्ति के उपरान्त मृत्यु को प्राप्त को जाते है

नवम भाव:- जन्म पत्रिका में बृहस्पति का नवम भाव में उपस्थित  होना उनके पूर्वजों की कृपादृष्टि और और उनके आशीर्वाद को दर्शाते है यह व्यक्ति अपनी पूर्वजों की कृपादृष्टि हमेशा प्राप्त करते है और भाग्यशाली होते हैं |

दशम भाव:- जन्म पत्रिका में गुरु यदि दशम भाव में स्थित हो तो जातक पूर्व जन्म में बहुत अधिक धार्मिक विचारों वाला होता है | वह इस जन्म में समाज-सुधारक का कार्य करता है | वह पूजा-पाठ आदि का दिखावा नहीं करता है अर्थात भगवान में पूर्ण श्रद्धा से विश्वास रखता है |

पंचम / एकादश भाव:- बृहस्पति की पंचम या ग्यारहवे भाव में उपस्थिति जातक को पूर्व-जन्म में तंत्र मंत्र,  गुप्त विद्या आदि के ज्ञान का संकेत दर्शाती है | अपने पूर्व-जन्म के फलस्वरूप वह इस जन्म में मानसिक रूप से पीड़ित रहता है और बुरी आत्माओ द्वारा उसे कष्ट प्राप्त होता है | वर्तमान जन्म में उसे संतान सुख भी कम ही प्राप्त होता है |

दशम भाव:- जन्मकुण्डली में गुरु यदि दशम भाव में उपस्थित हो तो जातक पूर्व जन्म में गुरु का ऋणी होता है और वर्तमान जन्म उसे उस ऋण को चुकाने के उद्देश्य से प्राप्त होता है उसका निवास-स्थान किसी तीर्थ-स्थल के पास होता है या निवास स्थान के पास देवालय स्थित होता है |

जन्म कुण्डली में शनि व राहु की उपस्थिति के संकेत:- 

जिस प्रकार गुरु की स्थिति से पूर्वजन्म का पता चलता है उसी तरह शनि व राहु की उपस्थिति से  भाग्य-कुभाग्य अथवा प्रारब्ध आदि की जानकारी प्राप्त होती है

प्रथम भाव:- यदि शनि, व राहु जन्मकुण्डली के लग्न में स्थित हो तो जातक को पिछले जन्म में जड़ी बूटियों आदि का ज्ञान होता है | वर्तमान जन्म में वह बहुत शांत-स्वभाव के व एकान्त प्रिय होते है | इन्हें अदृश्य  शक्तियों से सहायता प्राप्त होती है |

द्वितीय भाव:-> जन्मकुण्डली में शनि व राहु की उपस्थिति पूर्व जन्म में उसके द्वारा किय गये दुर्व्यवहार को बतलाती है पूर्व जन्म में जातक व्यक्तियों को सताने व कष्ट पहुँचाने वाला होता है | जिसके फलस्वरूप जातक हमेशा शारीरिक  बाधा में रहता है और इनका बचपन आर्थिक कष्टों में गुजरता है |

तृतीय भाव:- शनि व राहु तृतीय भाव में स्थित हो तो जातक वर्तमान के घर की अंतिम संतान होता है जातक को अदृश्य शक्तियों से भविष्य का ज्ञान होता रहता है

चतुर्थ भाव:- शनि व राहु की चतुर्थ भाव में उपस्थिति व्यक्ति को वर्तमान में मानसिक व उदर रोग से पीड़ित रखती है इन्हें सर्प भय लगा रहता है और इन्हें सर्पो के विषय में जानकारी रखना पसन्द होता है |

पंचम भाव :- इस भाव में राहु या शनि की उपस्थिति जातक के पूर्वजन्म में हत्यारा होने का संकेत देती है और वर्तमान जन्म में इनकी शिक्षा में रुकावटें पैदा होती रहती हैं तथा यह व्यक्ति संतान सम्बन्धी कष्टों से घिरे रहते हैं |

सप्तम भाव: इस भाव में इनकी उपस्थिति विपरीत लिंग के प्रति दुर्व्यवहार को दर्शाती है |

अष्टम भाव: शनि या राहु का इस भाव में स्थित होना जातक के पूर्व जन्म में तंत्र मंत्र टोटके आदि करने वाले व्यक्तित्व को दर्शाता है | वर्तमान जन्म में ये मानसिक रूप से ग्रसित रहते हैं तथा कोई आवश्यक भय हमेशा सताता रहता है

दशम भाव : इस गृह में शनि या राहु की उपस्थिति पूर्व जन्म में जातक का बहुत मेहनती व कर्मठ होना दर्शाता है | वर्तमान में यह सफल जीवन जीते हैं परन्तु तरक्की धीरे – धीरे ही होती है |

द्वादश भाव:  पूर्व जन्म में यह जातक निम्न योनि में होते हैं | ऐसे जातक सर्पों के आशीर्वाद से यह जन्म प्राप्त करते हैं  तथा इन्हें जीवन समस्त सुख प्राप्त होते हैं |

किसी जातक की जन्म पत्रिका में शनि या राहु इकट्ठे किसी भाव में हों तो जातक प्रेत दोष का शिकार होता है | यह आलसी प्रवृति के होते हैं इनका स्वभाव क्रोधपूर्ण होता है तथा पूजा के समय इन्हें नींद व उबासी आती हैं | यह जातक जन्म स्थान से दूर कामयाब होते हैं |

इस तरह हम जातक की जन्मपत्रिका द्वारा उसके पूर्वजन्म व उससे होने वाले कार्यों व प्रारब्ध की भी पड़ताल कर सकते  हैं|

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